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यूटीआई माइक्रो पेंशन

 

आँकड़े योजना की अपेक्षा कार्य की ओर इशारा करते हैं

  • विश्व में 60 से अधिक उम्र के प्रत्येक 6 में से एक व्यक्ति भारत में रहता है
  • यदि आज के वृद्ध लोग 60 की उम्र में कार्य करना बंद कर देते हैं, तो अगले 20 वर्षों तक जीवन यापन करने के लिए उनके पास अपने संपूर्ण जीवन की बचत पर निर्भर रहने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता
  • अगले दो दशकों में भारत में लगभग 20 करोड़ बुजुर्ग होने की संभावना है
  • आज भारत के 36 करोड़ वेतनभोगी कर्मचारियों में से केवल 11% ही संगठित क्षेत्र से संबंधित होते हैं
  • असंगठित क्षेत्र के कर्मचारियों को जीवनभर काम करने का डर बना रहता है, इसलिए एक औपचारिक पेंशन स्कीम आवश्यक है

भारत में असंगठित क्षेत्र के लिए सामाजिक सुरक्षा की कमी  
विश्व में 60 से अधिक की उम्र के प्रत्येक 6 लोगों में से एक भारत में रहता है. हालाँकि आज हमारे 8 करोड़ बुजुर्गों को पेंशन नहीं मिलती -- न तो सरकार की तरफ़ से और न ही उनके नियोक्ता की ओर से. पारंपरिक रूप से, हम में से अधिकांश लोग कार्य करना बंद करने के बाद संयुक्त परिवार प्रणाली और हमारे बच्चों की मदद पर निर्भर करते हैं. किंतु आज, जब हमारे बच्चे कमाना प्रारंभ करते हैं तो उन्हें दूसरी जगह जाकर बसने पर ज़ोर दिया जाता है और परिणामस्वरूप भारत में प्रत्येक 3 घरों में से 2 एकल परिवार होते हैं. इसलिए, वृद्धावस्था में हम परिवार की मदद पर अधिक निर्भर नहीं रह सकते.

यदि आज के वृद्ध लोग 60 की उम्र में कार्य करना बंद कर देते हैं, तो अगले 20 वर्षों तक जीवन बिताने के लिए उनके पास अपने संपूर्ण जीवन की बचत पर निर्भर रहने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता. और यदि तब तक उन्होंने अपने सक्रिय जीवन के दौरान पर्याप्त बचत नहीं की, तो शारीरिक रूप से कार्य करने में अक्षम होने पर उन्हें अपनी बचत बनाए रखने के लिए गंभीर जोख़िम और ग़रीबी का सामना करना पड़ता है. यही सब मैन्युअल कार्य में लगे लोगों के साथ ही किसानों, हमाल, रिक्शा चालक, बुनकर, निर्माण कार्य करने वाले और खेतिहर मज़दूरों के साथ भी होता है.

सरकार के लिए, यह बहुत ही गंभीर सामाजिक और आर्थिक चिंता का विषय है. अगले कुछ वर्षों में, ग़रीबी की जिन समस्याओं से हम आज जूझ रहे हैं वे बुजुर्गों के सामने आने वाल‍ी ग़रीबी की समस्या के सामने बौनी हो जाएँगी. विशेष रूप से चूँकि हमारे वर्तमान 8 करोड़ बुजुर्गों की जनसंख्या में तेज़ी से वृद्धि होने वाली है और अगले दो दशकों में भारत में इसके 20 करोड़ होने की संभावना है. हमारे वर्तमान बुजुर्गों की दुर्दशा बहुत कुछ श्रम बाज़ार की संरचना के कारण भी हुई है. आज भारत में 36 करोड़ वेतनभोगी कर्मचारियों में से केवल 11% संगठित क्षेत्र के कर्मचारी हैं, जिनमें सरकारी और बड़ी निजी कंपनियों के वेतनप्राप्त कर्मचारी हैं, जिन्हें पेंशन के अधिकार और लाभ मिलते हैं.

हालाँकि, भारत के अधिकांश लोग असंगठित क्षेत्र में कार्य करते हैं और उन्हें पारंपरिक रूप से औपचारिक पेंशन और प्रोविडेंट फ़ंड व्यवस्थाओं से दूर रखा जाता है. इनमें स्व-रोजगार करने वाले कर्मचारी जैसे किसान, खेतिहर मज़दूर, स्व-रोजगार महिलाएँ, अनुबंध के आधार पर काम करने वाले और आकस्मिक मजदूर तथा छोटे विक्रेता आते हैं. यदि इन कर्मचारियों को कोई औपचारिक पेंशन स्कीम प्राप्त नहीं होती, तो इनमें से अधिकांश लोगों के पास जीवन भर कार्य करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता.

ऊपर बताए गए बिंदु यह दर्शाते हैं कि अब हमें कदम उठाने की आवश्यकता है!

यूटीआई माइक्रो पेंशन अभियान उन कर्मचारियों का भविष्य सुरक्षित करता है जो असंगठित क्षेत्र में कार्य करते हैं.

माइक्रोपेंशन अभियान का विवरण

यूटीआई म्यूचुअल फ़ंड (यूटीआई एमएफ़) ने यूटीआई- बेनिफ़िट पेंशन फ़ंड के तहत माइक्रो-पेंशन अभियान द्वारा अपने सदस्यों को निवेश का अवसर प्रदान करने के लिए इन संगठनों के साथ एक व्यवस्था की शुरुआत की है:

  • यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया,
  • बिहार राज्य सहकारी दुग्ध निर्माता संघ मर्यादित (कॉम्पफेड - COMPFED), पारादीप पोर्ट और डॉक मज़दूर संघ
  • बैंक ऑफ़ इंडिया,
  • श्री महिला सेवा सहकारी बैंक मर्यादित और
  • स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास के लिए स्व-सहायता प्रसार (शेफ़र्ड - SHEPHERD)
यूटीआई म्यूचुअल फ़ंड द्वारा आसान बनाए गए माइक्रो-पेंशन अभियान के तहत बताए गए संगठनों के सदस्य यूटीआई-रिटायरमेंट बेनिफ़िट पेंशन फ़ंड में 55 वर्ष की उम्र तक एक छोटी राशि का योगदान देते हैं ताकि 58 वर्ष की उम्र तक पहुँचने के बाद वे आवधिक आय/नकदी प्रवाह के रूप में पेंशन प्राप्त करने के हक़दार हो सकें.

हमारा विश्वास है कि देखभाल संबंधी छोटी सी लहर कई ज़िंदगियों को सुधार सकती है.
 
 
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